जड़ें मजबूत रखो, भाषा से शुरू करो! घर में मातृभाषा बोलो ।
केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने अभिभावकों से कहा ।
जड़ें मजबूत रखो, भाषा से शुरू करो! घर में मातृभाषा बोलो । केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने त्रिपुरा के अगरतला में आयोजित संयुक्त क्षेत्रीय राजभाषा सम्मेलन (राजभाषा सम्मेलन) में अपने संबोधन के दौरान अभिभावकों से अपील की कि वे घर में अपने बच्चों से मातृभाषा में ही बातचीत करें। यह बयान हिंदी को राजभाषा के रूप में बढ़ावा देने के व्यापक संदर्भ में दिया गया था, साथ ही उन्होंने सभी भारतीय भाषाओं के सह-अस्तित्व और मजबूती पर जोर दिया।

शाह ने कहा कि यदि मातृभाषा नहीं सिखाई गई, तो भावी पीढ़ियां अपनी साहित्य, इतिहास और सांस्कृतिक परंपराओं से कट सकती हैं, जिससे उनकी जड़ों से जुड़ाव कमजोर पड़ जाएगा। उन्होंने हिंदी थोपने की अफवाहों को खारिज करते हुए कहा कि हिंदी और स्थानीय भाषाएं “एक ही मां की दो बहनें” हैं, और एक को बढ़ावा देने से दूसरी भी मजबूत होती है। उनका यह जोर भाषाई एकता में विविधता की दृष्टि से उपजा है, जहां मातृभाषाएं आधुनिकीकरण के बीच सांस्कृतिक पहचान को संरक्षित रखती हैं, ताकि बच्चे अपनी विरासत से जुड़े रहें और राष्ट्रीय एकीकरण को अपनाएं।
मुख्य संपादक डॉ. नम्रता मिश्रा तिवारी द्वारा : http://indiainput.com
मातृभाषा व्यक्ति की पहचान का आधार होती है। यह न केवल संवाद का माध्यम है, बल्कि सांस्कृतिक विरासत, इतिहास और परंपराओं का वाहक भी है। भारत जैसे बहुभाषी देश में मातृभाषा का महत्व और भी अधिक है, जहां हर भाषा अपनी अनोखी सांस्कृतिक गहराई लिए हुए है। मातृभाषा सीखना और बोलना बच्चों को उनकी जड़ों से जोड़ता है, जिससे वे अपनी सांस्कृतिक पहचान को मजबूत कर पाते हैं।
“Request all parents to talk to their children at home in their mother tongue.”
– HM Amit Shah at Rajbhasha Sammelan in Tripura pic.twitter.com/IayhG8awNm
— News Arena India (@NewsArenaIndia) February 20, 2026
मातृभाषा का सबसे बड़ा महत्व यह है कि यह भावनाओं और विचारों को सबसे सहज तरीके से व्यक्त करने की क्षमता प्रदान करती है। जब माता-पिता घर में बच्चों से मातृभाषा में बात करते हैं, तो बच्चे न केवल भाषा सीखते हैं, बल्कि उस भाषा से जुड़ी कहानियां, लोकगीत, परंपराएं और मूल्य भी ग्रहण करते हैं। उदाहरण के लिए, हिंदी, तमिल, बंगाली या गुजराती जैसी भाषाएं सदियों पुरानी साहित्यिक धरोहर से जुड़ी हैं। रामायण, महाभारत या तिरुक्कुरल जैसे ग्रंथों की समझ मातृभाषा के माध्यम से ही संभव है। यदि बच्चे इनसे वंचित रह जाते हैं, तो वे अपनी सांस्कृतिक जड़ों से कट जाते हैं, जिससे पहचान का संकट उत्पन्न होता है।
मातृभाषा जड़ों से जुड़ाव में कैसे मदद करती है? यह सांस्कृतिक निरंतरता सुनिश्चित करती है। वैश्वीकरण के दौर में अंग्रेजी जैसी विदेशी भाषाओं का प्रभुत्व बढ़ रहा है, लेकिन मातृभाषा बच्चों को अपनी मिट्टी की खुशबू से जोड़ती है। अध्ययनों से पता चलता है कि मातृभाषा में शिक्षा ग्रहण करने वाले बच्चे अधिक आत्मविश्वासी और रचनात्मक होते हैं। यूनेस्को के अनुसार, मातृभाषा संरक्षण से सांस्कृतिक विविधता बनी रहती है, जो वैश्विक स्तर पर महत्वपूर्ण है। भारत में नई शिक्षा नीति भी मातृभाषा पर जोर देती है, क्योंकि यह बच्चों को स्थानीय इतिहास, लोककथाओं और मूल्यों से जोड़ती है।
इसके अलावा, मातृभाषा भावनात्मक बंधन मजबूत करती है। परिवार में मातृभाषा का उपयोग पीढ़ियों के बीच पुल का काम करता है। दादा-दादी की कहानियां, त्योहारों की रस्में और स्थानीय मुहावरे मातृभाषा के जरिए ही जीवित रहते हैं। यदि बच्चे केवल विदेशी भाषा में सोचते-बोलते हैं, तो वे अपनी जड़ों से दूर हो जाते हैं, जिससे सांस्कृतिक विलोपन का खतरा बढ़ता है। मातृभाषा संरक्षण से हम अपनी विविधता को बचाते हैं और राष्ट्रीय एकता को मजबूत करते हैं।
संक्षेप में, मातृभाषा महत्वपूर्ण है क्योंकि यह जड़ों से जुड़ाव का माध्यम है। माता-पिता को घर में इसका उपयोग करना चाहिए, ताकि बच्चे अपनी विरासत को समझें और गर्व करें। इससे न केवल व्यक्तिगत विकास होता है, बल्कि समाज की सांस्कृतिक समृद्धि भी बनी रहती है।
स्रोत :
https://www.pib.gov.in/PressReleaseIframePage.aspx?PRID=2230947
https://www.youtube.com/watch?v=_6lk7dkhM0s
https://www.facebook.com/amitshahofficial/posts/1541606607320962
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