अलीगंज हादसे का सबक: प्रशासनिक लापरवाही या हमारी अपनी अनदेखी?
सुरक्षित भविष्य की खातिर अब अपनी सोच और संस्थान चुनने के तौर-तरीके बदलने होंगे।
अलीगंज हादसे का सबक: प्रशासनिक लापरवाही या हमारी अपनी अनदेखी? लखनऊ के अलीगंज की आग अब भले ही शांत हो गई हो, लेकिन उस भीषण हादसे ने जो जख्म छोड़े हैं, वे ताउम्र नहीं भरेंगे। उस त्रासदी ने समाज के सामने कई कड़वे सवाल खड़े कर दिए हैं, जिन्हें हम अक्सर नजरअंदाज कर देते हैं। क्या हम वास्तव में एक जिम्मेदार नागरिक के रूप में अपनी भूमिका निभा रहे हैं? यह सवाल आज हर उस व्यक्ति के लिए है जो व्यवस्था को तो दोष देता है, लेकिन खुद की जवाबदेही से किनारा कर लेता है।

_डॉ. सीमा सिंह, http://indiainput.com झारखंड डेस्क
व्यवस्था की लापरवाही बनाम हमारी उदासीनता
अक्सर किसी भी हादसे के बाद हम सरकार और प्रशासन को कोसने में कोई कसर नहीं छोड़ते। यह सच है कि प्रशासनिक लापरवाही को किसी भी सूरत में सही नहीं ठहराया जा सकता।
लेकिन क्या सिर्फ प्रशासन ही जिम्मेदार है? सवाल यह भी है कि उस इमारत में चल रहे व्यावसायिक प्रतिष्ठान क्या नियमों के दायरे में थे? जब हम ऐसी जगहों पर अपने बच्चों को भेजते हैं, तो क्या हम यह जांचने की जहमत उठाते हैं कि वह स्थान सुरक्षित है या नहीं? अपनी कार्यगुजारी पर ध्यान न देना भी एक बड़ी विफलता है।
माता-पिता की जागरूकता और सुरक्षा का सवाल
एक बहुत ही प्रासंगिक बात है—हम अपने बेटे-बेटियों की शादी तय करते समय हर छोटी-बड़ी जांच-पड़ताल करते हैं, फिर शिक्षण संस्थानों के मामले में इतनी लापरवाही क्यों? यह हर माता-पिता का नैतिक दायित्व है कि वे अपने बच्चों के लिए चुने गए संस्थान के सुरक्षा मानकों की खुद जांच करें।
हमने शायद यह मान लिया है कि हिंदुस्तान की भारी आबादी के बीच सुरक्षा के सभी पैमानों पर खरा उतरना नामुमकिन है। यही वह मानसिक कमजोरी है जिसका फायदा धनलोलुप शिक्षण संस्थान उठाते हैं। वे बच्चों को छोटे और असुरक्षित कमरों में ठूस देते हैं, और हम अपनी मजबूरी या उदासीनता के चलते इसे स्वीकार कर लेते हैं।
बदलाव की शुरुआत स्वयं से
यह दर्द झकझोरने वाला है कि शायद लखनऊ के इस हादसे के बाद भी लोग न अपने आचरण में बदलाव लाएंगे और न ही अपनी जागरूकता में। किसी भी आपात स्थिति में जब जान पर बन आती है, तब हम प्रशासन को दोष देते हैं। लेकिन क्या यह जिम्मेदारी हमारी नहीं है कि हम असुरक्षित वातावरण को बढ़ावा देना बंद करें?
हमें यह समझने की जरूरत है कि नागरिक जिम्मेदारी केवल वोट देने या कर चुकाने तक सीमित नहीं है। यह हमारे दैनिक जीवन के हर निर्णय में झलकनी चाहिए। अगर हम अपने बच्चों की सुरक्षा के प्रति खुद जागरूक नहीं होंगे, तो कोई भी व्यवस्था हमें उस हादसे से नहीं बचा पाएगी जो हमारी अपनी अनदेखी का परिणाम है।
समय आ गया है कि हम व्यवस्था को बदलने की मांग के साथ-साथ खुद को भी बदलें और एक सुरक्षित समाज की नींव रखें।
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