क्या है ‘सत्य’ या ‘सत्’ का भौतिकशास्त्र कनेक्शन?
सुधांशु त्रिवेदी ने बताया सत् श्री अकाल का वैज्ञानिक अर्थ!
‘सत्य’ या ‘सत्’ का भौतिकशास्त्र कनेक्शन है जो जबरदस्त गहरा अर्थ लिए है। भारतीय संस्कृति और दर्शन में सत्य या सत् को ब्रम्ह कहते है। सत्यं शिवम् सुंदरम भी कहा गया है। लेकिन यह सत्य क्या है? उदाहरण के लिए भारतीय संस्कृति में ‘सत श्री अकाल’ न केवल एक अभिवादन है, बल्कि यह एक गहरा वैज्ञानिक और आध्यात्मिक सूत्र है। सुधांशु त्रिवेदी ने इस वाक्यांश को आधुनिक भौतिकी (Modern Physics) और दर्शन के नजरिए से जिस तरह से परिभाषित किया है, वह हमें भौतिक रूप से अस्तित्व के मूल प्रश्नों तक ले जाता है।
मैकेनिकल इंजीनियरिंग के अध्यापक तथा भारतीय संस्कृति के जानकार डॉ सुधांशु त्रिवेदी ने क्या कुछ बताया सत् इस शब्द के गहन वैज्ञानिक अर्थ के विषय में, आइये जानें।

-डॉ. नम्रता मिश्रा तिवारी, मुख्य संपादक http://indiainput.com डेस्क
सत्य का भौतिक आधार: अपरिवर्तनीय तत्व
विज्ञान की दृष्टि से, हर पदार्थ छोटे-छोटे कणों (atoms/sub-atomic particles) से बना है। यदि हम किसी वस्तु को तोड़ते जाएं, तो अंत में हमें एक ऐसा ‘मूल तत्व’ प्राप्त होगा जिसे और विभाजित नहीं किया जा सकता। त्रिवेदी के अनुसार, यही ‘सत’ है।
वह तत्व जो स्थिर है, शाश्वत है और जिसमें कोई परिवर्तन (change) संभव नहीं है, वही सत्य है। भौतिक विज्ञान में भी ऊर्जा संरक्षण के नियम (Law of Conservation of Energy) की तरह, जो कभी नष्ट नहीं होता, उसे ही हम ‘सत’ या परम सत्य कह सकते हैं।
समय: परिवर्तन का एक पैमाना
हम समय को कैसे मापते हैं? घड़ी के कांटे या ग्रहों की गति दरअसल ‘परिवर्तन’ को ही मापती है। सुधांशु त्रिवेदी का तर्क है कि समय केवल एक ‘पैरामीटर’ है जो किसी सिस्टम में होने वाले बदलाव को दर्ज करता है।
कल्पना कीजिए, यदि इस ब्रह्मांड में कोई परिवर्तन ही न हो, तो क्या समय का अस्तित्व रहेगा? निश्चित रूप से नहीं। यदि कोई वस्तु या ऊर्जा ‘काल से परे’ (अकाल) है, तो इसका अर्थ है कि वह उस अवस्था में है जहाँ कोई भी भौतिक या रासायनिक परिवर्तन संभव नहीं है।
काल से परे की अवस्था
‘अकाल’ शब्द का अर्थ है वह जो काल (समय) के अधीन नहीं है। जब हम ईश्वर या ब्रह्म की बात करते हैं, तो हम एक ऐसी सत्ता की बात करते हैं जो स्थान (Space) और समय (Time) की सीमाओं से मुक्त है। ‘सत श्री अकाल’ का अर्थ है उस परम सत्ता को नमन करना जो शाश्वत है और जो भौतिक परिवर्तनों के चक्र से मुक्त है।
‘सत श्री अकाल’ का अर्थ केवल एक अभिवादन नहीं, बल्कि उस परम सत्य को नमन करना है जो शाश्वत है और समय व स्थान की सीमाओं से परे है। भगवान ही वह ‘सत’ हैं जिनमें कभी कोई परिवर्तन नहीं आता।
सुधांशु त्रिवेदी के अनुसार, यदि हम इस वाक्यांश की गहराई को समझ लें, तो हमें भारत के उस मूल तत्व का बोध हो जाएगा जो हजारों वर्षों से हमारी संस्कृति का आधार बना हुआ है। यह सीख हमें याद दिलाती है कि भौतिक जगत के परिवर्तनों के बीच, भीतर मौजूद वह शाश्वत तत्व ही वास्तव में ईश्वर का रूप है।
SOURCE :
https://www.bjp.org/dr-sudhanshu-trivedi
https://youtube.com/shorts/_jzsi7oD2p4?si=-KfKHmA12GmoiJyx
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