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झारखंड छात्र आंदोलन: न्याय और संघर्ष की अनकही दास्तान

झारखंड लोक सेवा आयोग यानी जेपीएससी और झारखंड कर्मचारी चयन आयोग यानी जेएसएससी की परीक्षाओं में पारदर्शिता और धांधली के खिलाफ युवाओं का रोष

झारखंड छात्र आंदोलन: न्याय और संघर्ष की अनकही दास्तान झारखंड की राजधानी रांची की सड़कों पर इस समय एक ऐसा नजारा दिख रहा है जो लोकतंत्र और संघर्ष की परिभाषा को नए सिरे से गढ़ रहा है। एक तरफ जहां झारखंड लोक सेवा आयोग यानी जेपीएससी और झारखंड कर्मचारी चयन आयोग यानी जेएसएससी की परीक्षाओं में पारदर्शिता और धांधली के खिलाफ युवाओं का रोष फूटा है, वहीं दूसरी तरफ यह आंदोलन इस बात की मिसाल बन गया है कि जमीनी संघर्ष और राजनीतिक रूप से प्रायोजित आयोजनों में जमीन-आसमान का फर्क होता है।

झारखंड
रांची के मोरहाबादी मैदान या राजभवन के पास छात्रों का शांतिपूर्ण प्रदर्शन

आज जब चार छात्र अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल पर बैठे हैं, तो यह सिर्फ एक परीक्षा का सवाल नहीं, बल्कि लाखों युवाओं के भविष्य की लड़ाई बन चुका है।

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सादगी और अनुशासन की अनूठी मिसाल

इस आंदोलन की सबसे बड़ी खूबी इसकी सादगी है। यहाँ न तो वीआईपी संस्कृति की चमक है और न ही बड़े कॉरपोरेट प्रायोजकों की फंडिंग। शहर के चौराहों पर चल रहे इस प्रदर्शन में फाइव-स्टार टेंट का नामोनिशान नहीं है; धूप और बारिश के बीच सिर पर तनी हुई टूटी-फूटी तिरपाल ही इन युवाओं का आशियाना है।

भूख से जूझते इन विद्यार्थियों के भोजन की व्यवस्था भी किसी भव्य होटल से कोसों दूर है। यहाँ न तो जुनैद की बिरयानी जैसी शाही दावतों का दिखावा है और न ही राजनीतिक रैलियों वाला तामझाम; यहाँ तो मंदिर का सादा लंगर ही इन संघर्षरत युवाओं की ऊर्जा का एकमात्र स्रोत है।

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पेशेवर आंदोलनजीवियों और जमीनी युवाओं का अंतर

आज के दौर में हर विरोध प्रदर्शन के पीछे किसी राजनीतिक दल का हाथ होने की आशंका रहती है, लेकिन झारखंड के ये छात्र एक अलग लकीर खींच रहे हैं। यहाँ कोई पेशेवर आंदोलनजीवी या किराए की भीड़ नजर नहीं आती। हर चेहरा उस युवा का है जिसने रातों की नींद खराब कर प्रतियोगिता परीक्षाओं की तैयारी की है।

इन युवाओं के हाथों में कैमरों की चमक की होड़ नहीं है, बल्कि इनके दिलों में अपनी मेहनत के अपमान के खिलाफ जलती हुई आग है। राजनीतिक अभियानों में अक्सर भीड़ को भड़काने या हिंसा फैलाने की कोशिश होती है, इसके विपरीत ये छात्र मार्च निकाल रहे हैं लेकिन न तो किसी को गाली दे रहे हैं और न ही किसी लिंचिंग पर आमादा हैं।

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शांतिपूर्ण विरोध: क्या अराजकता के बिना बदलाव संभव है?

यह आंदोलन एक बड़ा सवाल खड़े करता है कि क्या विरोध के लिए ड्रामा और हंगामा जरूरी है? इसका जवाब झारखंड के इन छात्रों ने दे दिया है। आंदोलन का मतलब केवल हंगामा या अराजकता फैलाना कतई नहीं है।

इतिहास गवाह है कि दुनिया के सबसे बड़े बदलाव शांतिपूर्ण और अनुशासित तरीकों से ही आए हैं। जब विरोध शांत होता है, तो आंदोलनकारियों की नैतिक श्रेष्ठता बढ़ जाती है। बिना किसी गाली-गलौज और हिंसा के सिर्फ अपनी आवाज बुलंद करना यह साबित करता है कि विरोध जताना और संविधान के दायरे में रहना साथ-साथ चल सकते हैं।

यह भूख हड़ताल केवल परीक्षा पास करने की मांग नहीं, बल्कि भ्रष्टाचार के खिलाफ एक नैतिक युद्ध है। मजबूत इरादों और वैचारिक स्पष्टता से उपजी यह सच्ची क्रांति साबित करती है कि जब देश का युवा अपने हक के लिए खुद सड़कों पर उतरता है, तो उसे किसी प्रायोजक की जरूरत नहीं पड़ती।

SOURCE : 

http://jssc.nic.in

http://jpsc.gov.in

 

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