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राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू की भावुक अपील: “मैं बहुत दुखी हूं”

प्रोटोकॉल की कमी के बावजूद राष्ट्रपति की उद्यमशीलता बनी प्रेरणा, संथाल संस्कृति को मिली नई पहचान

राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू की भावुक अपील:”मैं बहुत दुखी हूं, ममता दीदी से नाराज हैं क्या?” भारत की प्रथम आदिवासी राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने पश्चिम बंगाल के दार्जिलिंग में आयोजित नौवें अंतरराष्ट्रीय संथाल सम्मेलन के दौरान एक ऐसी मिसाल कायम की, जो न केवल आदिवासी समुदाय की सांस्कृतिक धरोहर को उजागर करती है, बल्कि प्रशासनिक लापरवाही के बावजूद उनकी साहसिकता और संवेदनशीलता को भी दर्शाती है। 7 मार्च 2026 को दार्जिलिंग पहुंचीं राष्ट्रपति मुर्मू ने सम्मेलन को संबोधित किया, लेकिन आयोजन स्थल के चयन पर खुलकर निराशा जाहिर की।

 

 

उन्होंने कहा कि प्रशासन ने एक संकुचित और दूरस्थ स्थान चुना, जहां संथाल समुदाय के लाखों लोग पहुंच ही नहीं सके। “यहां तो पांच लाख लोग आसानी से इकट्ठा हो सकते थे, लेकिन प्रशासन ने हमें इतनी दूर क्यों ले जाया?” – उनके ये शब्द न केवल दर्द भरे थे, बल्कि एक मां की तरह समुदाय की भावनाओं को प्रतिबिंबित कर रहे थे।

 

द्वारा _ http://indiainput.com डेस्क

‘सोहराई’ चित्रकला

 

सम्मेलन के बाद, राष्ट्रपति मुर्मू ने स्वयं पहल की और संथाल समुदाय के पारंपरिक स्थल – एक विशाल, प्राकृतिक सौंदर्य से भरपूर मैदान – का दौरा किया। यह वह जगह थी, जहां संथालों की सदियों पुरानी सांस्कृतिक विरासत सांस लेती है। हरी-भरी पहाड़ियां, पारंपरिक नृत्य-गीतों की गूंज और आदिवासी कला के नमूने – राष्ट्रपति ने खुद इनका अवलोकन किया। वे पीले साड़ी में सादगी से घूमती हुईं, स्थानीय संथाल महिलाओं से बातें करतीं, उनके संघर्षों को सुनतीं। एक वृद्ध संथाल महिला ने उन्हें पारंपरिक ‘सोहराई’ चित्रकला दिखाई, जो दीवारों पर प्रकृति और जीवन के चित्र उकेरती है।

राष्ट्रपति मुर्मू, जो स्वयं संथाल समुदाय से ताल्लुक रखती हैं, ने कहा, “यह हमारी जड़ें हैं। स्वतंत्रता संग्राम में संथालों का योगदान इतिहास के पन्नों में कम ही दर्ज है, लेकिन आज हम इसे जीवंत करेंगे।”

उद्यमशीलता और सौहार्द

 

यह घटना प्रशासनिक भूल को उजागर करने के साथ-साथ राष्ट्रपति की उद्यमशीलता का प्रतीक बनी। ममता बनर्जी सरकार पर विपक्ष ने तीखा प्रहार किया, लेकिन राष्ट्रपति ने राजनीति से ऊपर उठकर समुदाय की एकता पर जोर दिया। उन्होंने कहा, “मैं भी बंगाल की बेटी हूं, ममता दीदी मेरी छोटी बहन हैं।”

उनका यह बयान सौहार्द का संदेश देता है। संथाल सम्मेलन ने आदिवासी संस्कृति को वैश्विक पटल पर लाया – संथाल भाषा, संगीत, नृत्य और कृषि परंपराओं पर चर्चा हुई। राष्ट्रपति ने युवाओं को प्रोत्साहित किया कि वे अपनी विरासत को आधुनिकता से जोड़ें, पर्यटन और शिक्षा के माध्यम से।

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आदिवासी सशक्तिकरण

 

राष्ट्रपति मुर्मू का यह दौरा आदिवासी सशक्तिकरण की नई दिशा है। दार्जिलिंग की चाय बागानों से घिरी यह भूमि, जहां संथालों ने ब्रिटिश राज के खिलाफ विद्रोह किया, आज फिर जागृत हो रही है। उनके शब्दों में, “संथाल संस्कृति भारत की आत्मा है।”

यह यात्रा न केवल सम्मेलन की सफलता बनी, बल्कि लाखों आदिवासियों के लिए प्रेरणा स्रोत। प्रशासन की गलती के बावजूद, राष्ट्रपति की स्वतंत्र खोज ने संथाल धरोहर को नई ऊंचाइयों पर पहुंचा दिया। यह घटना हमें सिखाती है कि सच्ची नेतृत्व क्षमता बाधाओं को पार करने में निहित है।

स्रोत : 

http://www.presidentofindia.gov.in

http://x.com 

https://www.pib.gov.in/

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