डिजिटल क्रांति या बौद्धिक पतन? ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ का कड़वा सच।
व्यवस्थागत दीमक और युवाओं का गिरता ग्राफ।
डिजिटल क्रांति या बौद्धिक पतन? ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ का कड़वा सच।आज के दौर में सोशल मीडिया पर ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ (CJU) का नाम एक डिजिटल सुनामी बनकर उभरा है। यह आंदोलन व्यवस्था की खामियों के खिलाफ युवाओं के आक्रोश का एक ज्वलंत उदाहरण है।
लेकिन, क्या हमने कभी रुककर सोचा है कि यह ‘क्रांति’ वास्तव में हमें कहाँ ले जा रही है? क्या यह व्यवस्था को सुधार रही है, या फिर यह उस दीमक की तरह है जो धीरे-धीरे हमारे युवाओं के बौद्धिक भविष्य को अंदर से खोखला कर रही है?

Dr.सीमा सिंह, द्वारा indiainput.com Desk के लिए धनबाद, झारखंड से।
हताशा की सुरंग
दीमक का स्वभाव होता है कि वह चुपचाप मजबूत ढांचे को भीतर से कुतरती रहती है, और जब तक हमें पता चलता है, इमारत गिरने की कगार पर होती है।
ठीक वैसे ही, ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ के नाम पर फैलाया जा रहा यह निराशावाद और व्यंग्यात्मक प्रतिशोध Gen Z की सोचने और रचनात्मक कार्य करने की क्षमता पर प्रहार कर रहा है।
जब युवा अपनी पूरी मानसिक ऊर्जा केवल मीम्स, ऑनलाइन ट्रोलिंग और व्यवस्था को कोसने में खर्च कर देते हैं, तो वे वास्तविक कौशल विकास और ठोस समाधानों से दूर होते चले जाते हैं।
बौद्धिक अपरदन
यह आंदोलन एक प्रकार का ‘बौद्धिक अपरदन’ है। यह युवाओं के मन में यह धारणा बैठा रहा है कि मेहनत और धैर्य के बजाय केवल डिजिटल शोर मचाकर ही सब कुछ हासिल किया जा सकता है।
यह ‘दीमक’ रूपी विचारधार युवाओं को हताशा की उस सुरंग में धकेल रही है जहाँ से उन्हें निर्माण के बजाय केवल विनाश और विरोध ही नजर आता है।
हकीकत यह है कि व्यवस्था की विफलताएँ भले ही गहरी हों, लेकिन उनका इलाज केवल ‘डिजिटल क्रांति’ का दिखावा करना नहीं है।
दिशाहीन ऊर्जा
अगर हम इस बौद्धिक खोखलेपन को समय रहते नहीं रोक पाए, तो यह पीढ़ी केवल एक ‘पीड़ित पीढ़ी’ के रूप में इतिहास में दर्ज होगी। क्रांति के लिए ऊर्जा का सही दिशा में बहना अनिवार्य है, न कि उसे व्यर्थ के आभासी युद्धों में जला देना।
हमें यह याद रखना होगा कि एक जागरूक और तार्किक नागरिक ही वह असली शक्ति है जो सत्ता के गलियारों में जमी व्यवस्थागत दीमक को उखाड़ फेंक सकती है। समय आ गया है कि युवा अपनी ऊर्जा को आक्रोश से हटाकर अपने भविष्य के निर्माण में लगाएँ।
संक्षेप में, CJU उस ‘दीमक’ का एक डिजिटल अवतार है जो व्यवस्था की विफलताओं से पोषित हो रही है, लेकिन इसका परिणाम अंततः Gen Z की उसी रचनात्मक और तार्किक बुद्धि का पतन है, जिसे इस देश का भविष्य माना जाता है।
यदि वे समय रहते इस बौद्धिक खोखलेपन को नहीं पहचान पाए, तो वे केवल एक ‘पीड़ित पीढ़ी’ बनकर रह जाएंगे।
शेयर करें और अपनी राय दें—क्या हमें केवल विरोध करना चाहिए या समाधान का हिस्सा बनना चाहिए?
SOURCE :
FEEDBACK: contact@indiainput.com
CATCHUP FOR MORE ON : http://indiainput.com



