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मैथिलीशरण गुप्त : खड़ी बोली हिंदी के प्रथम राष्ट्रकवि।

भारत-भारती का आह्वान: गुप्त जी का साहित्यिक योगदान, 'साकेत' की भक्ति, 'पंचवटी' का प्रेम और पद्म भूषण सम्मान।

मैथिलीशरण गुप्त : खड़ी बोली हिंदी के प्रथम राष्ट्रकवि। हिन्दी काव्यधारा के इतिहास में बीसवीं शताब्दी का प्रारंभिक चरण एक ऐसे युग का साक्षी रहा, जिसने परम्परागत ब्रजभाषा की मोह-माया को त्याग कर खड़ी बोली को साहित्य के शिखर पर स्थापित किया। इस महत्वपूर्ण बदलाव के सूत्रधार थे राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त। उनकी लेखनी ने सिर्फ़ भाषा को नया आयाम नहीं दिया, बल्कि तत्कालीन राष्ट्रीय, सामाजिक और सांस्कृतिक चेतना को एक नई ऊर्जा से भर दिया।

गुप्त जी का जन्म तीन अगस्त, अठारह सौ छियासी को चिरगाँव, झाँसी में हुआ, लेकिन उनकी कर्मभूमि सम्पूर्ण राष्ट्र रहा। उन्हें हिन्दी साहित्य में ‘दद्दा’ के नाम से भी जाना जाता है।

लेखक- डॉ. नम्रता मिश्रा तिवारी, प्रधान संपादक https://indiainput.com

जो भरा नहीं है भावों से जिसमें बहती रसधार नहीं

वह हृदय नहीं है पत्थर है, जिसमें स्वदेश का प्यार नही

 – राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त।

एक ऐसे समय में जब देश ब्रिटिश शासन के अंधकार से जूझ रहा था, गुप्त जी ने अपनी रचनाओं के माध्यम से सुप्त राष्ट्रीय गौरव को जगाया। उनकी कालजयी कृति ‘भारत-भारती’ (उन्नीस सौ बारह) ने देश के अतीत की महिमा और वर्तमान की दुर्दशा का ऐसा मार्मिक चित्रण किया कि यह पुस्तक स्वतंत्रता संग्राम के सेनानियों के लिए एक प्रेरणास्रोत बन गई।

सब तीर्थों का एक तीर्थ यह ह्रदय पवित्र बना लें हम

आओ यहाँ अजातशत्रु बन, सबको मित्र बना लें हम

रेखाएँ प्रस्तुत हैं, अपने मन के चित्र बना लें हम 

सौ-सौ आदर्शों को लेकर एक चरित्र बना लें हम ।

 – राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त।

महात्मा गाँधी ने उनकी राष्ट्रीय भावनाओं से ओतप्रोत रचनाओं को देखकर ही उन्हें ‘राष्ट्रकवि’ की उपाधि से अलंकृत किया था।

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गुप्त जी की प्रतिभा बहुआयामी थी। उन्होंने पौराणिक, ऐतिहासिक और सामाजिक विषयों पर लगभग पचास से अधिक कृतियों की रचना की।

जहाँ एक ओर ‘साकेत’ महाकाव्य में उन्होंने उपेक्षित पात्र उर्मिला को केंद्रीय स्थान देकर राम-भक्ति की एक आधुनिक और मानवीय व्याख्या प्रस्तुत की, वहीं दूसरी ओर ‘यशोधरा’ में गौतम बुद्ध के गृह-त्याग के पश्चात उनकी पत्नी की भावनाओं को स्वर दिया।

उनकी रचना ‘पंचवटी’ प्रकृति के मनोरम सौंदर्य के साथ-साथ नैतिक मूल्यों का भी संदेश देती है।

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६० वर्षों के साहित्यिक सफर में उन्होंने लगभग ५० पुस्तकें लिखीं और उनके योगदान के लिए १९५४ में उन्हें पद्म भूषण से सम्मानित किया गया।

आज जब हम पद्यह दिसंबर, उन्नीस सौ चौंसठ को इस महान राष्ट्रकवि की पुण्यतिथि पर उन्हें याद कर रहे हैं, तो यह महसूस होता है कि उनका साहित्य आज भी उतना ही प्रासंगिक है।

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मैथिलीशरण गुप्त न केवल खड़ी बोली हिंदी के प्रथम राष्ट्रीय कवि थे, बल्कि वे आधुनिक भारतीय पुनर्जागरण के एक ऐसे स्तम्भ थे, जिन्होंने अपनी कविता को राष्ट्रसेवा का माध्यम बनाया।

उनके द्वारा रोपे गए राष्ट्रवाद, संस्कृति और इतिहास के बीज आज भी हमें प्रेरणा देते हैं। ऐसे महान साहित्यकार और राष्ट्रसेवक को शत-शत नमन।

स्रोत :

http://x.com 

http://mygov.in

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